व्यापार मंत्र

भारत में एलोवेरा जेल व जूस का व्यापार कैसे शुरू करें – Aloe Vera Farming and Aloe Vera Gel/Juice Business In India  

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एलोवेरा (Aloe Vera) औषधीय गुणों का प्राकृतिक ख़ज़ाना है। अपने चमत्कारिक औषधीय गुणों (medicinal properties) के लिए यह पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। भारत में इसेघृत कुमारीऔरग्वारपाठाजैसे कई नामों से जाना जाता है। इसमें मौजूद औषधीय तत्वों के कारण इसका सबसे अधिक उपयोग आयुर्वेदिक एवं हर्बल दवाओं तथा सौंदर्य प्रसाधनों (beauty products) में किया जाता है।

आजकल बाज़ार में एलोवेरा जूस और जेल (Aloe Vera Juice and Gel) की माँग बहुत ज़्यादा है। नतीज़तन इसकी खेती(aloe vera plantation and cultivation) और इससे संबंधित उत्पादों के व्यवसाय में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हो रही है।

एलोवेरा जूस या जेल का व्यवसाय कम लागत पर अधिक लाभ देने वाले व्यवसायों में से एक है। यही कारण है कि आजकल केवल किसान ही नहीं बल्कि विभिन्न व्यावसायिक एवं तकनीकी क्षेत्रों से संबंध रखने वाले युवा उद्यमी भी एलोवेरा की खेती कर इसके जूस और जेल का व्यवसाय कर रहे हैं।

Bharat me aloe vera ki kheti kaise kare

Aloe Vera

Aloe Vera Farming In India

एलोवेरा की खेती एवं व्यवसाय संबंधी जानकारी

एलोवेरा का व्यापार दो प्रकार से किया जा सकता है। आप इसकी खेती करके इसकी पत्तियाँ (leaves) और गूदा (pulp) आयुर्वेदिक एवं हर्बल दवा निर्माता तथा सौंदर्य प्रसाधन निर्माता कंपनियों को बेच सकते हैं। इसके अतिरिक्त एलोवेरा का प्रसंस्करण प्लांट (aloe vera processing plant) लगाकर इसका जूस या जेल बनाने का व्यापार भी कर सकते हैं

अगर आपके पास पर्याप्त बजट हो तो एलोवेरा जूस के उत्पादन से लेकर पैकिंग तक सभी काम अपने घर से ही कर सकेंगे।

एलोवेरा की मुख्य प्रजातियाँ

एलोवेरा की विभिन्न प्रजातियों में से एलोय चीनेंसिस (Aloe Chinensis), एलोय लित्तोरालिस (Aloe Littoralis) और एलोय अब्यस्सिनिका (Aloe Abyssinica) खेती के दृष्टिकोण से सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। भारत में इनकी सबसे अधिक उपजाऊ प्रजातियाँ आईईसी 111271, आईईसी 111269 तथा एएएल-1 हैं।

एलोवेरा की खेती के लिए उपयुक्त मृदा एवं जलवायु

एलोवेरा की खेती के लिए शीतोष्ण (temperate)एवं समशीतोष्ण (mid-temperate) जलवायु अच्छी रहती है। इसके लिए ऐसे क्षेत्र बढ़िया रहते हैं जहाँ बहुत ज़्यादा वर्षा हो और नमी बनी रहे। एलोवेरा की खेती किसी भी तरह की मिट्टी में की जा सकती है लेकिन मिट्टी का पीएच लेवल 6.5 से 8 के मध्य होना चाहिए।

एलोवेरा की खेती के लिए ऐसा स्थान चुनें जहाँ पानी का जमाव ना हो क्योंकि जलमग्न मिट्टी में एलोवेरा की फसल ठीक से नहीं बढ़ पाती। इसलिए जल निकासी की उचित व्यवस्था का होना भी अनिवार्य है।

खाद, रोपाई एवं सिंचाई का प्रबंधन

एलोवेरा की रोपाई प्रायः जूनजुलाई के दौरान की जाती है। अगर सिंचाई की अच्छी व्यवस्था हो तो फ़रवरीमार्च के महीने में भी रोपाई कर सकते हैं। इसकी रोपाई से पहले खेत की जुताई करके मिट्टी में 10-15 टन प्रति हेक्टेयर के अनुपात से गोबर की खाद और उर्वरक मिलाकर अच्छे से तैयार कर लें। उसके बाद उसमें 50×45 सेमी की दूरी पर पौधे रोपें। यह अंतर्वर्तीय (intermediate) फसल है इसलिए इसे अन्य औषधीय वृक्षों के बीच में भी उगाया जा सकता है।

इस फसल की सिंचाई के लिए आप छिड़काव या ड्रिप विधि का प्रयोग कर सकते हैं। वैसे तो इस फसल को बहुत ज़्यादा सिंचाई की ज़रुरत नहीं होती लेकिन गर्मियों में 20-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना ठीक रहता है।

एलोवेरा की फसल में रोग एवं कीट नियंत्रण

एलोवेरा का स्वाद कड़वा होने के कारण इसे जानवर नहीं खाते। इसलिए जानवरों से इसकी फसल को ख़तरा नहीं होता। इसकी फसल में रोग एवं कीटों की परेशानी बहुत कम होती है। लेकिन फसल को सुरक्षित रखने के लिए समयसमय पर आवश्यक कीटनाशकों का छिड़काव करना बहुत ज़रूरी है।

फसल की पैदावार और कटाई

सही प्रबंधन और उचित देखभाल की जाये तो एलोवेरा की पैदावार काफी अच्छी होती है। पौध लगने के बाद इसकी फसल तैयार होने में तक़रीबन एक साल का समय लगता है। इसकी खेती करने वाले जानकारों की मानें तो इस समयांतराल के बाद एलोवेरा की पहली फसल काटी जा सकती है। उसके बाद हर दो महीने पर इसकी पत्तियों की कटाई कर सकते हैं।

एलोवेरा के पौधारोपण के बाद अगले तीन सालों तक लगातार फसल काटी जा सकती है। अगर फसल की नियमित रूप से पर्याप्त सिंचाई की जाये तो एक हेक्टेयर भूमि की फसल से 30-35 टन तक उत्पादन मिल सकता है। दूसरे साल में एलोवेरा की पैदावार में लगभग 10-15 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। तीसरे साल में भी फसल अच्छी रहती है और साथ ही मुनाफ़ा भी बढ़िया होता है। उसके बाद चौथे साल से पैदावार घटने लगती है।

एलोवेरा की खेती में आने वाली लागत और मिलने वाला लाभ

एलोवेरा का एक पौधा नर्सरी से लगभग 3-4 रूपये में मिलता है। शुरुआत में 1 एकड़ ज़मीन में लगभग 16 हज़ार एलोवेरा के पौधे रोपे जाते हैं। पौधों, खाद सिंचाई इत्यादि सभी ख़र्चों को मिलाकर एलोवेरा की खेती के पहले साल में लगभग 80 हज़ार से 1 लाख रूपये तक की लागत आती है।

आप एलोवेरा की पत्तियाँ और इससे निर्मित उत्पाद भी बेच सकते हैं। एक एकड़ की फसल से आपको 8000-10000 किग्रा तक पत्तियाँ मिलती हैं। एलोवेरा के एक पौधे की पत्तियों से एक बार में लगभग 400-500 मिली तक गूदा निकलता है।

एलोवेरा की खेती कर रहे किसानों एवं व्यवसायियों का कहना है कि इसकी पत्तियाँ बेचने से ज़्यादा मुनाफ़ा इसका गूदा (pulp) बेचने में है। एलोवेरा की पत्तियाँ 4-8 रूपये प्रति किग्रा के हिसाब से बिकती हैं जबकि इसका गूदा 20-30 रूपये प्रति किग्रा के हिसाब से बिकता है। इसलिए एलोवेरा का गूदा निकालकर बेचने में इसकी पत्तियों की तुलना में चार से पाँच गुना फ़ायदा होता है।

एलोवेरा की पत्तियों को कटाई होने के बाद 4-5 घंटे में ही प्रसंस्करण इकाई (processing unit) पर भेजना ज़रूरी होता है। अगर आप ख़ुद इसके जूस या जेल का निर्माण करके बाज़ार में बेचते हैं तो लाभ और बढ़ जाता है।

अगर आपके पास अपनी ज़मीन उपलब्ध हो तो आप अनुबंध खेती (contract farming) से भी शुरुआत कर सकते हैं।

एलोवेरा प्रसंस्करण संयंत्र (Aloe Vera Processing Plant) की जानकारी

अगर आपकी योजना एलोवेरा जूस या जेल बनाने की है तो आपको एलोवेरा प्रसंस्करण संयंत्र लगाना होगा। इसकी मदद से आप एलोवेरा का जूस बनाने से लेकर उसकी पैकिंग करने तक का काम कर सकते हैं। इसके लिए बाज़ार में दो प्रकार के संयंत्र (processing plant) मिलते हैंस्वचालित (automatic) और अर्धस्वचालित (semi-automatic)। आप अपने बजट के अनुरूप इनमें से उपयुक्त विकल्प का चुनाव कर सकते हैं।

Aloe Vera Gel , Aloe Vera Juice

Aloe Vera Gel

एलोवेरा की खेती और व्यवसाय के लिए ज़रूरी पंजीकरण एवं लाइसेंस

एलोवेरा की खेती करने और इससे निर्मित उत्पाद बेचने के लिए आपको अपने उद्योग को एमएसएमई (MSME) के अंतर्गत पंजीकृत (register) कराना होगा। अगर आप एलोवेरा जूस या जेल का निर्माण करते हैं तो भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (fssai – Food Safety and Standards Authority of India : http://fssai.gov.in/hi/home) से लाइसेंस लेना अनिवार्य है।

अगर आप एलोवेरा के सौंदर्य प्रसाधन बनाते हैं तो उसके लिए आपको अलग से लाइसेंस की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त अपने क्षेत्र विशेष के नियमों के अनुसार आवश्यक लाइसेंस एवं क़ानूनी प्रक्रियाओं के विषय में पता करके उन्हें पूरा अवश्य कर लें।

सरकार द्वारा उपलब्ध सहायता

एलोवेरा जूस या जेल का व्यवसाय करने वाले किसानों एवं उद्यमियों को खादी ग्रामोद्योग आयोग (KVIC – Khadi and Village Industries Commission : http://www.kvic.org.in/kvicres/index.html) द्वारा शुरुआत में व्यवसाय की कुल लागत का 90% ऋण उपलब्ध कराया जाता है। साथ ही उन्हें 25% की सब्सिडी भी मिलती है। इतना ही नहीं, इस ऋण पर तीन साल तक कोई ब्याज़ भी नहीं देना पड़ता है।

इसके साथ ही आप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR – Indian Council of Agricultural Research : https://icar.org.in/) से सम्बद्ध राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (National Bureau of Plant Genetic Resources : http://www.nbpgr.ernet.in/) से भी इस व्यवसाय के सम्बन्ध में परामर्श ले सकते हैं।

सीमैप (CIMAP) द्वारा एलोवेरा प्रसंस्करण का प्रशिक्षण

एलोवेरा की खेती करने और इसका प्रसंस्करण संयंत्र (processing plant)लगाने के इच्छुक उद्यमियों को सरकार द्वारा भी प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) – Central Institute of Medicinal and Aromatic Plants (CIMAP) : http://www.cimap.res.in/hindi/index.php द्वारा समयसमय पर विभिन्न क्षेत्रों में कार्यशाला का आयोजन किया जाता है।

इसमें एलोवेरा प्रसंस्करण तकनीक प्रशिक्षण कार्यक्रम (Aloe Vera Processing Technique Training Program) के अंतर्गत आप एलोवेरा के processing से सम्बंधित प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। एक निश्चित शुल्क का भुगतान कर इस कार्यक्रम में आप ऑनलाइन पंजीकरण करा सकते हैं।

किसी कंपनी के साथ contract करके ही करें खेती की शुरूआत

एलोवेरा की खेती में संलग्न अधिकांश किसानों का सुझाव है कि इसकी खेती की शुरुआत किसी कंपनी से अनुबंध (contract) करके ही करनी चाहिए। एलोवेरा की माँग मुख्य रूप से स्वास्थ्य देखभाल (healthcare) सौंदर्य प्रसाधन (cosmetics) और वस्त्र उद्योग (textile industry) में है। इसलिए आप इन क्षेत्रों से संबद्ध कंपनियों से अपनी फसल की बिक्री के लिए क़रार कर सकते हैं।

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