प्रेरणादायक कहानियाँ

प्लास्टिक की बोतल नहीं अब लचीले बुलबुले में मिलेगा पानी, पीयें ही नहीं खाएं भी!

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पानी तो आप रोज़ाना पीते हैं, कभी ग्लास से और कभी बोतल से। पर क्या आपने कभी बुलबुले से पानी पीने के बारे में सुना है? नहीं? तो फिर ऐसा करने को तैयार हो जाइए। इतना ही नहीं, अब आप अपने  पानी के बोतल को फेंकने के बजाय खा भी सकते हैं। जी हाँ! अब जल्द ही आपको पानी एक गोलाकार लचीले बुलबुले में मिलेगा जिसे खाकर आप अपनी प्यास बुझा सकते हैं।

क्या आपको पता है? – एक प्लास्टिक की बोतल या कप को डिकॉम्पोज़ होने में या यूँ कहें कि प्रकृति में वापस मिल जाने में 700 साल लग जाते हैं। सिर्फ अमेरिका को ही ले लें तो वहां लगभग 50 बिलियन प्लास्टिक बोतलों की सालाना खपत होती है और उनमें से लगभग आधे को ही हम रीसाइकल यानि पुनः प्रयोग में ला पाते हैं और आधा यूँ ही कचड़े के रूप में इकठ्ठा होता रहता है। इन बातों से आप अनुमान लगा सकते हैं कि पूरी दुनिया में रोजाना इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक बोतलों से पर्यावरण को कितना बड़ा खतरा है और हमारे सामने इसकी खपत को कम करने की कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है। इसी समस्या का हल निकालने के लिए लन्दन के एक पैकेजिंग स्टार्टअप स्किपिंग रॉक्स लैब (Skipping Rocks Lab) ने ओहो (Ooho) नामक एक अनूठा प्रोडक्ट तैयार किया है। इसकी मदद से अब आप पानी को प्लास्टिक की बोतल की जगह होली के गुब्बारे जैसे दिखने वाले एक लचीले बुलबुले से पीयेंगे या खायेंगे। यह कंपनी पौधों और सीवीड जैसे प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग तैयार करने में अग्रसर है।

Interesting story of Ooho – Skipping Rocks Lab 

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क्या है ओहो?

ओहो जिलेटिन के समान लचीला, एक दोहरी परत वाला गोलाकार पैकेजिंग है जिसमें पानी भरा रहता है। यह देखने में पानी के एक छोटे बॉल या एक बड़े बुलबुले जैसा लगता है। इसका निर्माण पौधों और सीवीड नामक समुद्री शैवाल से प्राप्त प्राकृतिक उत्पाद से किया गया है। इसके निर्माण में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ स्वतः नष्ट हो जाने में सक्षम है। इसके प्राकृतिक गुणों की वजह से ही अगर पानी के इस गोले को पैकेजिंग के साथ ही खा लिया जाए तो भी शरीर को कोई हानि नहीं पहुँचती और अगर पानी पीने के बाद पैकेजिंग को फेंक दिया जाए तो 4-6 हफ़्तों में यह स्वतः नष्ट हो जाता है। इस वजह से ओहो से पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुँचती। वैसे तो पैकेजिंग का कोई स्वाद नहीं होता परन्तु उसमें विभिन्न फ्लेवर डालकर उसे स्वादिष्ट भी बनाया जा सकता है।

प्रोडक्ट की तरह ही निर्माण की प्रक्रिया भी है अनूठी

ओहो का निर्माण ‘स्फेरीफिकेशन’ (spherification) नामक एक पाक-प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। यह प्रक्रिया पहली बार 1946 में इस्तेमाल में लाई गई थी और आज के समय में भी आधुनिक व्यंजनों में कुछ शेफ इसका उपयोग करते हैं। इस पैकेजिंग को बनाने के लिए बर्फ के छोटे-छोटे गोलों पर समुद्री शैवालों से प्राप्त होने वाले तरल पदार्थ की झिल्लीनुमा परत चढ़ाई जाती है। जब यह झिल्ली जमकर सख़्त होती है तो इसके अंदर बंद बर्फ़ का गोला पिघलकर पानी बन जाता है। इस तरह यह बायो-डिग्रेडेबल, एडीबल और इको-फ्रेंडली बुलबुला तैयार होता है।

ओहो को बनाने में केवल 2 सेंट का ख़र्च आता है जो प्लास्टिक के उत्पादन से बहुत सस्ता है। इसे तैयार करने का तरीका भी इतना सरल है कि आप अपने किचन में भी इसे बना सकते हैं। इससे पानी पीने के लिए पहले इसकी बाहरी परत को छिलके की तरह उतारकर अलग किया जाता है और उसके बाद आप इसमें छेद करके इससे पानी पी सकते हैं या फिर इसे चबाकर खा भी सकते हैं।

स्किपिंग रॉक्स लैब के सफल प्रयोग से बना ओहो

ओहो का निर्माण करने वाला ‘स्किपिंग रॉक्स लैब’ नामक यह स्टार्टअप यूरोपियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी द्वारा संचालित क्लाइमेट के.आई.सी (KIC) के एक्सेलेरेशन प्रोग्राम का एक हिस्सा है। इस स्टार्टअप के सह-संथापक रोड्रिगो गार्सिआ गोंज़ालेज़ (Rodrigo García González) और पियर इव्स पास्लिएर (Pierre-Yves Paslier) नामक स्पेनिश डिज़ाइनर हैं जिनका ध्यान प्लास्टिक की बोतलों से बढ़ते पर्यावरण की समस्या पर पड़ा और उन्होंने कुछ ऐसा बनाने का सोचा जो प्लास्टिक बोतलों का स्थान ले सके।  इन दोनों की मुलाकात इनोवेशन डिज़ाइन इंजीनियरिंग मास्टर्स के दौरान हुई और तभी से दोनों ने मिलकर ओहो की संरचना पर काम करना शुरू कर दिया। रोड्रिगो एक आर्किटेक्ट हैं और पियर मैकेनिकल इंजिनियर। पढ़ाई पूरी करने के बाद इन दोनों ने मिलकर 2014 में ‘स्किपिंग रॉक्स लैब’ की स्थापना की और अपने कार्यक्षेत्र से बिल्कुल अलग अपने आपको प्लास्टिक को रिप्लेस करने वाली ऐसी वस्तु बनाने का कठिन लक्ष्य दिया जो प्रकृति को हानि न पहुंचाए। इनके साथ अब केमिस्ट्स, इंजीनियर्स और सलाहकारों की एक उम्दा टीम है।

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इस स्टार्टअप के लिए कार्यरत वैज्ञानिकों की एक टीम इम्पीरियल कॉलेज ऑफ़ लंदन में भी स्थापित है जो लगातार नए प्रयोगों से अपने प्रोडक्ट को बेहतर बनाने में जुटी रहती है। ऐसे ही नवीन प्रयोगों और नियमित परीक्षण के बाद ओहो जैसा अनूठा प्रोडक्ट बनकर तैयार हुआ है। स्किपिंग रॉक्स लैब को इस खोज के लिए बहुत सारे अन्तराष्ट्रीय अवार्ड्स मिल चुके हैं।

इवेंट्स, फ़ेस्टिवल और मैराथन में ओहो

निर्माण के बाद ओहो का इस्तेमाल कुछ दिनों तक ही किया जा सकता है क्योंकि उसके बाद यह ख़राब अथवा स्वतः नष्ट होने लगता है। इसलिए वर्तमान में ओहो का इस्तेमाल ज़्यादातर इवेंट्स, फ़ेस्टिवलों और मैराथन आयोजनों के दौरान हो रहा है। ऐसे कार्यक्रमों अथवा आयोजनों में भारी संख्या में लोग जुटते हैं। उनके लिए पेयजल उपलब्ध कराने के लिए पहले ज़्यादातर प्लास्टिक की बोतलों का ही इस्तेमाल किया जाता था जिसकी वजह से आयोजन के बाद हज़ारों लाखों की संख्या में कूड़े में इन बोतलों का ढ़ेर लग जाता था। लेकिन अब इसका बेहतरीन इको-फ्रेंडली विकल्प बनकर ओहो धीरे-धीरे लोकप्रियता हासिल कर रहा है।

बाज़ार में हर तरफ ओहो को पहुँचाने की है तैयारी

अप्रैल 2017 की शुरुआत में स्किपिंग रॉक्स लैब ने फंड जुटाने के लिए United Kingdom की मशहूर क्राउडफंडिंग वेबसाइट क्राउडक्यूब का सहारा लिया और एक मिलियन डॉलर से भी ज्यादा की पूँजी जुटा ली। फिलहाल यह स्टार्टअप फेस्टिवल और मैराथनों में इस्तेमाल होने वाले छोटे बोतलों को ओहो से प्रतिस्थापित करने के प्रयास में लगा हुआ है और साथ ही साथ एक ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित करने में लगा है जिससे आने वाले समय में ओहो को खान-पान की दुकानों या कॉफ़ी शॉप्स में आसानी से बनाया जा सके और लोग खाना खरीदते समय बोतल वाले पानी की जगह ओहो खरीदें। इसके साथ ही एक नए प्रोडक्ट पर भी प्रयोग चल रहा है जिससे पानी के अलावा अन्य पदार्थों के लिए भी ओहो जैसा सस्टेनेबल पैकेजिंग बनाया जा सके।

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बिज़नेस कहानी की राय

प्लास्टिक की बोतल में पानी पीने से हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को होने वाले नुकसान से हम सभी अच्छी तरह परिचित हैं। लेकिन फिर भी हममें से ज़्यादातर लोग कोई आसान विकल्प ना होने की वजह से हर रोज़ इसका इस्तेमाल करते हैं, न केवल घर से बाहर सफर के दौरान बल्कि अपने घर में भी। इसके कारण पूरे विश्व में हर एक मिनट में दस लाख से भी ज़्यादा प्लास्टिक की बोतलें खाली होकर कूड़े के ढ़ेर में शामिल हो जाती हैं जिसमें से एक तिहाई से भी कम बोतलें ही रीसाइकल होकर दोबारा काम में आती हैं और बाकी सब समुद्र के गर्भ में समा जाती हैं। यह पर्यावरण के साथ ही समुद्री जीवों और इंसानों के लिए भी नुकसानदायक है। ओहो जैसे प्रोडक्ट के इस्तेमाल से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता जिसके कारण यह प्लास्टिक बोतलों का एक बेहतरीन विकल्प है।

इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसी सोच रखने वाले और दुनिया को एक अच्छा भविष्य देने वाले उद्यमियों को हम सभी सफल देखना चाहते हैं। यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि ओहो किस स्तर पर  सफलता हासिल कर पाता है परन्तु इस कहानी से हम सभी को अपने वातावरण को सुरक्षित बनाने वाले बिज़नेस की स्थापना करने की प्रेरणा जरुर मिलती है।

इस रोचक कहानी को जरुर शेयर करें और अपने मित्रों को भी ऐसे अच्छे प्रोडक्ट बनाने की प्रेरणा दें।

 

 

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