प्रेरणादायक कहानियाँ

आयरलैंड की बेटी ने पूरी दुनिया को जोड़ना सिखाया – Success Story Of Sugru

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दुनिया के 175 से भी ज्यादा देशों में बिकने वाले सुगरू (Sugru) की कहानी त्याग, अथक परिश्रम और हर मुश्किलों के ऊपर विजय पाने के अटल संकल्प की मिसाल है. आज सुगरु घर-घर में जाना जाता है और इसका इस्तेमाल करके हर कोई टूटी वस्तुएं जोड़ रहा है या घर की वस्तुयों को नया रूप दे रहा है. आयरलैंड में किल्केनी (Kilkenny) के एक ग्रामीण परिवार की बेटी ने दुनिया को इस अद्भुत वस्तु से परिचित करवाया और एक सफल बिज़नेस की स्थापना की.

क्या है Sugru?

सुगरू एक सिलिकॉन रबर जैसा पदार्थ है जिसे किसी भी आकार की वस्तु को जोड़ने में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. यह बाकी गोंदों से इस मामले में अलग है कि यह अपने वायुरोधी पैकेजिंग से निकलने के बाद तीस मिनट के लिए प्लास्टिक के गुण बरकरार रखता है और लगभग 24 घंटे में कमरे के तापमान पर स्वयं सेट हो जाता है. एक बार सेट हो जाने के बाद यह इस्तेमाल किये हुए वस्तु से मजबूती से जुड़ जाता है और इस तरह किसी भी टूटी वस्तु को जोड़ा जा सकता है. इतना ही नहीं, सुगरू विभिन्न रंगों में उपलब्ध है सो इसका इस्तेमाल करके किसी भी सामान को एक नई डिज़ाइन या आकार दे सकते हैं जैसे कि घर के चाकू के पीछे सुगरु लगा कर एक अच्छी पकड़ वाला हैंडल बना सकते हैं. यह एल्यूमीनियम, इस्पात, तांबे, मिट्टी के बरतन, कांच, कपड़े, पीतल, चमड़े, प्लाईवुड, और प्लास्टिक सहित सभी पदार्थों को जोड़ सकता है. यह वाटरप्रूफ़, डिशवाशर सेफ और थर्मल इंसुलेटिंग होता है जिस पर −50 से लेकर 180°C के तापमान का कोई असर नहीं होता. विभिन्न गुणों के पदार्थों को मजबूती से एक दूसरे के साथ जोड़ पाने और स्वयं किसी भी आकार में परिवर्तित होकर एक उपयोगी वस्तु बन जाने के गुणों की वजह से सुगरु एक अनोखा प्रोडक्ट है और पूरी दुनिया में तेजी से प्रसिध्द हो रहा है.

Sugru की खोज     

सुगरु की खोज Jane Ni Dhulchaointigh (आयरिश भाषा में उच्चारण – जेन नी गुलक्वीनटिग) ने की. 2003 में जेन को लन्दन के मशहूर रॉयल कालेज ऑफ़ आर्ट्स (RCA) से प्रोडक्ट डिज़ाइन में MA करते हुए कुछ अलग करने का विचार आया और एक दिन ऐसे ही प्रयोग के दौरान सिलिकॉन को लकड़ी के बुरादे से मिक्स करने पर एक खूब उछलने वाला गेंद जैसा पदार्थ बन गया. यह बात जेन के दिमाग में घूमने लगी कि क्या कोई ऐसा पदार्थ बनाया जा सकता है जो उपयोग करने में आसान हो और मजबूती से जोड़ने वाला भी हो. जेन सिलिकॉन को चिकनी मिट्टी से मिक्स करके अपने घर में वस्तुओं को जोड़ने और नई डिज़ाइन देने में उपयोग करने लगी और उसे एहसास हो गया कि अगर इसको अच्छे से विकसित किया जाए तो एक अनोखा प्रोडक्ट बन सकता है जो घर- घर में उपयोगी हो सकता है.

जेन का भरोसा इस आइडिया पर और बढ़ गया जब उसने 2004 में अपने कॉलेज की प्रदर्शनी में लोगों को अपने प्रोडक्ट का सैंपल दिखाया. सैंपल देखने के बाद सभी लोग उसका दाम पूछने लगे और जानना चाहे कि कहाँ से खरीद सकते हैं. जेन को पता था कि उसका शुरुआती प्रोडक्ट मार्केट में बिकने के लिए तैयार नहीं है और उसमें सुधार की आवश्यकता है. जेन ने इसको अच्छे से तैयार करने का फैसला लेकर अपनी टीम बनानी शुरू कर दी. 2005 में उसने अपने तत्कालीन बॉयफ्रेंड जेम्स (जो अब उनके पति हैं), बिज़नेस पार्टनर रॉजर और दो रिटायर्ड साइंटिस्ट्स इअन और स्टीव तथा एक पेटेंट लॉयर डेविड के साथ काम शुरू करने के लिए टीम बनायी. दोनों साइंटिस्ट्स सिलिकॉन इंडस्ट्री में ऊँचे पद पर काम कर चुके थे और उनको सिलिकॉन के गुणों का काफी अनुभव था.

आंसुओं पर विजय

2005 में ब्रिटिश रिसर्च फर्म नेस्टा (Nesta) द्वारा दिए गये पहले £35,000 के ग्रांट से काम शुरू हुआ जिससे पहले स्तर का प्रोडक्ट बना और पेटेंट फाइल हो गया. इस पेटेंट के बाद उनको एक वेंचर कैपिटल से फंडिंग मिली और प्रोडक्ट को अगले स्तर तक ले जाने का काम शुरू हुआ. दिसम्बर 2008 तक पूरी फंडिंग खत्म हो चुकी थी और बैंक से ओवरड्राफ्ट भी मिलना मुश्किल हो गया था. सितम्बर 2008 से पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी आ गयी थी और कोई भी इन्वेस्टर नए बिज़नेस में पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं था. इतने सालों के अथक परिश्रम के बाद भी ना तो प्रोडक्ट तैयार था, ना पैसे बचे थे और ना ही किसी बड़े स्टोर से बेचने का करार हुआ था. जेन को लगा कि उसका सपना चूर-चूर हो जायेगा और वह उदास रहने लगी. स्वाभाव से जुझारू जेन को हार मंजूर नहीं था और वह सभी खास लोगों से सलाह लेने लगी. जनवरी 2009 में उसकी एक दोस्त ने सलाह दिया कि वह छोटी शुरुआत पर ध्यान दे और उसे अच्छा बनाये. यह सलाह जेन को सही लगी और वह अब काम को छोटे स्तर पर करने के लिए पर्याप्त धनराशि का जुगाड़ ढूँढने लगीं. 2009 की गर्मियों में एक प्राइवेट इन्वेस्टर से काम भर को पैसे मिल गए और सुगरु टीम ने 6 महीने के अन्दर मार्केट में आने के संकल्प के साथ काम शुरू कर दिया.

1 दिसम्बर 2009 को सुगरु के इतिहास में एक सुनहरा मोड़ आया जब 5 साल की मेहनत और 5,000 घंटों से भी ज्यादा किये हुए एक्सपेरिमेंट के बाद सुगरु ऑनलाइन बाज़ार में उतरा और 6 घंटों में 1,000 पैकेट बिक गए. इसके बाद 2010 से सुगरु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. आज सुगरु दुनिया के 175 से भी ज्यादा देशों में ऑनलाइन और बड़े स्टोर्स के जरिये बिकता है तथा 50 लाख पाउंड्स (40-42 करोड़ रुपये) से भी ज्यादा का सालाना कारोबार करता है. सुगरु को बनाने वाली कंपनी का नाम फॉर्मफॉर्मफॉर्म लिमिटेड (FormFormForm Ltd) है जो लन्दन के हैकनी नामक जगह पर है और जेन इस कम्पनी की सीईओ हैं. सितम्बर 2017 में कंपनी ने बच्चों के लिए Sugru का नया प्रोडक्ट बनाया है जो बच्चों की नाजुक त्वचा के लिए उपयुक्त है. इस नए प्रोडक्ट से सुगरु के बिक्री में और भी तेजी आने की संभावना है.

बिज़नेस कहानी की राय

सभी सफल व्यवसायों की तरह सुगरु को भी आज के समय में देखकर यही लगता है कि इतने उपयोगी प्रोडक्ट को सफल तो होना ही था. परन्तु इस बिज़नेस की यात्रा को कांसेप्ट स्टेज से लेकर लांच और सफल बनने तक देखकर यह समझ में आ जाता है कि मेहनत, लगन और किसी भी सूरत में हार ना स्वीकार करना ही सफलता का रास्ता तय कराता है. बिज़नेस के क्षेत्र में कभी भी तुरंत सफलता की उम्मीद लेकर कदम नहीं रखना चाहिए और चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए. यदि आप हर एक समस्या का समाधान करने के लिए तैयार रहेंगे तो सफलता जरुर मिलेगी.

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