प्रेरणादायक कहानियाँ

एक भारतीय वैज्ञानिक ने Vitabiotics की नींव रखकर जमाई 100 से भी ज्यादा देशों में अपनी धाक  

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‘वाइटाबायोटिक्स’ (Vitabiotics – UK’s No.1 Vitamin Company) के संस्थापक और चेयरमैन डॉ. करतार सिंह लालवानी (Dr. Kartar Singh Lalvani OBE) ने ब्रिटेन से शुरुआत करके भारत सहित 106 से भी ज्यादा देशों में अपने बिज़नेस का विस्तार किया। इस मुश्किल काम को संभव करके उन्होंने पूरी दुनिया के उद्यमियों के लिए मिसाल कायम की।

Vitabiotics – Science Of Healthy Living Kahani In Hindi

30 करोड़ पाउंड्स (लगभग 2,700 करोड़ रुपये) से भी अधिक के सालाना टर्नओवर वाली इस कंपनी को 2013 में विटामिन अनुसंधान में नवीन खोज के लिए क्वींस सम्मान (Queen’s Award for Innovation in Vitamin Research) भी दिया गया।

वाइटाबायोटिक्स की शानदार सफ़लता के साथ जुड़ी है उसके संस्थापक डॉ. करतार सिंह लालवानी के जीवन की दर्द, जोश, कठिन परिश्रम और सफलता की कहानी। 2010 में उन्हें ब्रिटेन के प्रतिष्ठित सम्मान ‘आर्डर ऑफ़ ब्रिटिश एम्पायर’ (OBE) से भी सम्मानित किया जा चुका है।

शुरूआत से ही नई दवाईयों की ख़ोज में लगता था मन

डॉ. करतार सिंह लालवानी का जन्म 1931 में भारत के विभाजन से पहले कराची (पाकिस्तान) में हुआ। उनके पिता का सिंध में दवाईयों और चिकित्सा सामग्री का सबसे बड़ा व्यवसाय था। लेकिन 1947 में विभाजन के दौरान उनके परिवार को अपना सब कुछ कराची में ही छोड़कर मुंबई (तत्कालीन बम्बई) आना पड़ा।

मुंबई पहुँचकर उनके पिता ने किसी तरह प्रबंध करके नए सिरे से दवाईयों का व्यापार शुरू किया। उस समय करतार सिंह लगभग 16 वर्ष के थे और उनका रूझान नई-नई दवाईयों की खोज करने की तरफ था। उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपना करियर फ़ार्मेसी के क्षेत्र में ही बनायेंगे।

अहमदाबाद में फ़ार्मेसी में स्नातक करने के बाद 1958 में उन्होंने लंदन में फ़ार्मेसी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। 1962 में उन्होंने जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय (Bonn University) से फ़ार्मास्यूटिकल केमिस्ट्री में डॉक्टरेट पूरा किया।

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वाइटाबायोटिक्स की स्थापना

डॉक्टरेट पूरा करने के बाद डॉ. लालवानी लन्दन में ही एक रिसर्च केमिस्ट के रूप में काम करने लगे। उनका झुकाव विटामिन्स के मिश्रणों और मिनरल्स के अध्ययन की ओर था।

एक बार जब उनके मुँह में छाले (mouth ulcer) हुए तो उन्होंने विभिन्न दवाओं का इस्तेमाल किया परन्तु उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ। तब उन्होंने अपने आप ही दवाई बनाकर तैयार की और अपने मुँह के छालों को पूरी तरह ठीक कर लिया।

1967 में उन्होंने ब्रिटेन में अपनी बनाई हुई माउथ अल्सर की उस दवाई के फ़ॉर्मूले का पेटेंट लिया। उसके बाद उन्होंने अपने फ़ॉर्मूले को बेचने या रॉयल्टी के बदले में उसके इस्तेमाल का अधिकार देने के लिए कई बड़ी-बड़ी दवा निर्माता कंपनियों से संपर्क किया लेकिन उन्हें सफ़लता नहीं मिली।

आख़िरकार उन्होंने ख़ुद ही उस दवा को बनाने का फ़ैसला किया। यह फैसला भी आसान नहीं था क्योंकि उनके पास कुछ खास पूँजी बची नहीं थी और बैंकों या वित्तीय संस्थानों से भी कोई लोन नहीं मिल रहा था। किसी तरह पैसों का जोड़-तोड़ करके बहुत छोटे पैमाने पर 1971 में ‘वाइटाबायोटिक्स’ की शुरुआत हुई जिसका सबसे पहला उत्पाद ‘ओरल्सर’ (Oralcer) था।

खुद मार्केटिंग करके बनाई बाज़ार में जगह

अपनी कंपनी स्थापित करने के बाद डॉ. लालवानी ख़ुद ही मार्केटिंग करते थे। केमिस्टों और दवा के व्यापारियों के दुकानों का चक्कर लगाते रहते थे और किसी तरह छोटे-मोटे आर्डर ही ला पाते थे। लेकिन उन्होंने अपना मनोबल कभी गिरने नहीं दिया और अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा रखा।

उसी संघर्ष के दौरान उन्हें नाइज़ीरिया में अपना एक मल्टीविटामिन उत्पाद ओमेगा-एच थ्री (Omega-H3) निर्यात करने का अवसर मिला। वहाँ उनके उत्पाद को अच्छी प्रतिक्रिया मिली जिससे उनके व्यवसाय ने भी रफ़्तार पकड़ी।

ओमेगा-एच थ्री (Omega-H3) की धमाकेदार सफलता ने ‘वाइटाबायोटिक्स’ को खूब मजबूत बनाया और कंपनी सफलता के रास्ते पर अग्रसर हो गयी। आज भी उनका यह उत्पाद बिक्री के मामले में कई देशों में पहले स्थान पर है।

एकएक करके चढ़ते गए सफ़लता के पायदान

इसके बाद डॉ. लालवानी ने ब्रिटेन में अपने उत्पादों का खूब प्रचार-प्रसार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि ब्रिटेन में बड़ी-बड़ी दुकानों जैसे कि बूट्स (Boots) इत्यादि ने भी वाइटाबायोटिक्स के उत्पाद बेचना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे उन्होंने विटामिन और मिनरल आधारित अन्य उत्पाद बाज़ार में पेश किये जिन्हें लोगों ने बहुत पसंद किया।

डॉ. लालवानी के शिक्षक रह चुके प्रख्यात वैज्ञानिक और प्रोफ़ेसर आर्नोल्ड बैकेट (Arnold Beckett OBE) 1992 में वाइटाबायोटिक्स से बतौर चेयरमैन जुड़े। 2010 में उनके निधन तक प्रोफ़ेसर आर्नोल्ड बैकेट इस कंपनी के प्रमुख बने रहे।

चार दशकों से शानदार प्रदर्शन

47 वर्षों से भी ज़्यादा समय से न्यूट्रास्यूटिकल क्षेत्र में स्थापित ‘वाइटाबायोटिक्स’ को वैश्विक स्तर पर अपने उम्दा उत्पादों के लिए जाना जाता है। वर्तमान में ब्रिटेन और भारत सहित 106 से भी ज़्यादा देशों में इसके उत्पादों का निर्यात और विक्रय किया जाता है।

इसके उत्पादों में विभिन्न श्रेणियों में अलग-अलग ब्रांड्स के तहत सभी आयु वर्ग के बच्चों, महिलाओं एवं पुरुषों के लिए विटामिन और मिनरल पूरक आहार उपलब्ध हैं।

वाइटाबायोटिक्स के ब्रांड्स – प्रेग्नाकेयर (Pregnacare), मेनोपेस (Menopace), पर्फ़ेक्टिल (Perfectil), वेलमैन (Wellman), वेलवुमन (Wellwoman), इम्युनेस (Immunace), ज्वाइंटेस (Jointace) और ऑस्टियोकेयर (Osteocare) जैसे उत्पाद पूरी दुनिया में बहुत प्रचलित हैं।

अपने उत्कृष्ट उत्पादों एवं बेहतरीन प्रदर्शन के लिए इस कंपनी को अब तक कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चुका है।

धर्मार्थ एवं सामाजिक कार्यों में भी रूचि

डॉ. लालवानी व्यवसाय के साथ ही धर्मार्थ एवं सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हुए हैं। वे गुरु नानक देव जी से बहुत प्रभावित हैं और अपने जीवन में भी उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं।

2015 में गुरु नानक देव जी के जीवन पर आधारित धार्मिक फ़िल्म ‘नानक शाह फ़कीर’ की मार्केटिंग में उन्होंने काफी योगदान दिया था। साथ ही उन्होंने लंदन में उसकी विशेष स्क्रीनिंग का भी प्रबंध किया था।

पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं तेज़ लालवानी

वर्तमान में डॉ. लालवानी के बेटे तेज़ लालवानी (Tej Lalvani) ‘वाइटाबायोटिक्स’ के सीईओ (CEO) हैं। अपने पिता से प्रेरणा लेकर वे भी उन्हीं की तरह व्यवसाय के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

2013 में तेज लालवानी को ‘द इंडस आंत्रप्रेन्योर्स’ (The Indus Entrepreneurs – TiE) द्वारा वर्ष के युवा उद्यमी के सम्मान से सम्मानित किया गया। 

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2017 में तेज़ लालवानी को बीबीसी (BBC) के लोकप्रिय रियलिटी शो ‘ड्रैगन्स डेन’ (Dragon’s Den) में दिग्गज व्यापारियों के साथ एक ही मंच पर उपस्थित होने का अवसर भी प्राप्त हो चुका है।

बिज़नेस कहानी की राय

यह बात सही है कि हम सभी को अपने-अपने जीवन की बाधाएं बड़ी लगती हैं परन्तु दुनिया में ढूँढने से आपको ऐसे अनेकों उदाहरण मिलेंगे जिनके सामने आपकी समस्या बहुत छोटी लगने लगेगी।

भारत-पाकिस्तान के भयावह बंटवारे का अनुभव, पिता का सब-कुछ खो देने के बाद फिर से पैर जमाने का संघर्ष और उसके बाद ब्रिटेन में 60 और 70 के दशक में अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़कर बिज़नेस जमाने के लिए अनगिनत दरवाजे खटखटाने का दर्द। इन सभी अनुभवों और संघर्षो के बावजूद डॉ. करतार सिंह लालवानी ओबीई (OBE) ने सफलता का वो मुकाम हासिल किया जो अच्छे-अच्छों के लिए सिर्फ सपना ही है।

क्या आपको अभी भी लगता है कि सफलता पाने के लिए आपके रास्ते में बहुत बाधाएं हैं और आपके साथ किस्मत ने न्याय नहीं किया है? क्या आपको लगता है कि आपकी सफलता के लिए कोई और जिम्मेदार है? इस बिज़नेस कहानी से आपके विचारों पर क्या असर हुआ?

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